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Showing posts from June, 2020

निंदा_से_डरे

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🌿🌿#निंदा_से_डरे🌱🌱🌿☘ एक बार की बात है की एक राजा ने यह फैसला लिया के वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाया करेगा। एक दिन खीर वाले दूध में सांप ने मुंह डाला और दूध में विष डाल दी और ज़हरीली खीर को खाकर 100 के 100 अंधे व्यक्ति मर गए। राजा बहुत परेशान हुआ कि मुझे 100 आदमियों की हत्या का पाप लगेगा। राजा परेशानी की हालत में अपने राज्य को छोड़कर जंगलों में भक्ति करने के लिए चल पड़ा, ताकि इस पाप की माफी मिल सके। रास्ते में एक गांव आया। राजा ने चौपाल में बैठे लोगों से पूछा की क्या इस गांव में कोई भक्ति भाव वाला परिवार है ? ताकि उसके घर रात काटी जा सके। चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गांव में दो बहन भाई रहते हैं जो खूब बंदगी करते हैं। राजा उनके घर रात ठहर गया। सुबह जब राजा उठा तो लड़की सिमरन पर बैठी हुई थी । इससे पहले लड़की का रूटीन था की वह दिन निकलने से पहले ही सिमरन से उठ जाती थी और नाश्ता तैयार करती थी। लेकिन उस दिन वह लड़की बहुत देर तक सिमरन पर बैठी रही। जब लड़की सिमरन से उठी तो उसके भाई ने कहा की बहन तू इतना लेट उठी है ,अपने घर मुसाफिर आया हुआ है। इसने नाश्ता करके दूर जाना है। ...

भक्तों के पीछे फिरे, भक्त वच्छल भगवन्त।।

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*सतगुरु देव जी की जय* *मीरा बाई को कैसे कबीर साहिब की शरण मिली* 👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇🌹🌷 जिस श्री कृष्ण जी के मंदिर में मीराबाई पूजा करने जाती थी, उसके माबर्ग में एक छोटा बगीचा था। उसमें कुछ घनी छाया वाले वृक्ष भी थे। उस बगीचे में परमेश्वर कबीर जी तथा संत रविदास जी सत्संग कर रहे थे। सुबह के लगभग 10 बजे का समय था। मीरा जी ने देखा कि यहाँ परमात्मा की चर्चा या कथा चल रही है। कुछ देर सुनकर चलते हैं। परमेश्वर कबीर जी ने सत्संग में संक्षिप्त सृष्टि रचना का ज्ञान सुनाया। कहा कि श्री कृष्ण जी यानि श्री विष्णु जी से ऊपर अन्य सर्वशक्तिमान परमात्मा है। जन्म-मरण समाप्त नहीं हुआ तो भक्ति करना न करना समान है। जन्म-मरण तो श्री कृष्ण जी (श्री विष्णु) का भी समाप्त नहीं है। उसके पुजारियों का कैसे होगा। जैसे हिन्दू संतजन कहते हैं कि गीता का ज्ञान श्री कृष्ण अर्थात् श्री विष्णु जी ने अर्जुन को बताया। गीता ज्ञानदाता गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 10 श्लोक 2 में स्पष्ट कर रहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। इससे स्वसिद्ध है कि श्री...

मीराबाई परमात्मा की शरण में

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( आइए जानते है मीरा बाई को कैसे कबीर साहिब की शरण मिली ) जिस श्री कृष्ण जी के मंदिर में मीराबाई पूजा करने जाती थी, उसके मार्ग में एक छोटा बगीचा था। उसमें कुछ घनी छाया वाले वृक्ष भी थे। उस बगीचे में परमेश्वर कबीर जी तथा संत रविदास जी सत्संग कर रहे थे। सुबह के लगभग 10 बजे का समय था। मीरा जी ने देखा कि यहाँ परमात्मा की चर्चा या कथा चल रही है। कुछ देर सुनकर चलते हैं। परमेश्वर कबीर जी ने सत्संग में संक्षिप्त सृष्टि रचना का ज्ञान सुनाया। कहा कि श्री कृष्ण जी यानि श्री विष्णु जी से ऊपर अन्य सर्वशक्तिमान परमात्मा है। जन्म-मरण समाप्त नहीं हुआ तो भक्ति करना न करना समान है। जन्म-मरण तो श्री कृष्ण जी (श्री विष्णु) का भी समाप्त नहीं है। उसके पुजारियों का कैसे होगा। जैसे हिन्दू संतजन कहते हैं कि गीता का ज्ञान श्री कृष्ण अर्थात् श्री विष्णु जी ने अर्जुन को बताया। गीता ज्ञानदाता गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 10 श्लोक 2 में स्पष्ट कर रहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। इससे स्वसिद्ध है कि श्री कृष्ण जी का भी जन्म-मरण समाप्त नहीं है। ...

पांडवों का यज्ञ संपन्न कैसे हुआ

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श्री कृष्ण जी के भोजन करने के बाद भी पांडवों के यज्ञ का शंख नहीं बजा। जैसा कि सर्व विदित है कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया था तथा शस्त्र त्याग कर युद्ध के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच में खड़े रथ के पिछले हिस्से में आंखों से आँसू बहाता हुआ बैठ गया था। तब भगवान कृष्ण के अन्दर प्रवेश काल शक्ति (ब्रह्म) अर्जुन को युद्ध करने की राय देने लगा था। तब अर्जुन ने कहा था कि भगवान यह घोर पाप मैं नहीं करूँगा। इससे अच्छा तो भिक्षा का अन्न भी खा कर गुजारा कर लेंगे। तब भगवान काल श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रवेश करके बोला था कि अर्जुन युद्ध कर। तुझे कोई पाप नहीं लगेगा।  देखें गीता जी के अध्याय 11 के श्लोक 33, अध्याय 2 के श्लोक 37, 38 में। महाभारत में लेख (प्रकरण) आता है कि कृष्ण जी के कहने से अर्जुन ने युद्ध करना स्वीकार कर लिया। घमासान युद्ध हुआ। करोड़ों व्यक्ति व सर्व कौरव युद्ध में मारे गए और पाण्डव विजयी हुए। तब पाण्डव प्रमुख युधिष्ठिर को राज्य सिंहासन पर बैठाने के लिए स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा तो यिधष्ठिर ने यह कहते हुए गद्दी पर बैठने से मना कर दिया कि मैं ऐसे पाप ...

अगर_आपके_पास_वक़्त_हो_तो_ही_पढ़े

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#अगर_आपके_पास_वक़्त_हो_तो_ही_पढ़े  साभार  आज कोपरगाँव (महाराष्ट्र) से अपने रास्ते पर, मैंने एक बुजुर्ग दंपति को सड़क के किनारे चलते देखा। जैसा कि मेरी सामान्य आदत है, मैंने बस भिखारी दिखने वाले जोड़े से दोपहर होने के कारण भोजन के लिए कहा परंतु उन्होने मना कर दिया फिर मैंने उन्हें 100/- देना चाहा, पर वे उसे भी लेने से इंकार कर दिया, फिर मेरा अगला सवाल आप लोग ऐसे क्यों घूम रहे हैं, फिर उन्होंनें उनकी जीवनी बतानी शुरू की - उन्होंने 2200 किमी की यात्रा की और अब द्वारका में अपने घर जा रहे थे। उन्होंने बताया कि मेरी दोनों आंखें 1 साल पहले चली गई थीं। डॉक्टर ने कहा कि ऑपरेशन करना बेकार है, तब मेरी मां ने डॉक्टर से चिरौरी कर ऑपरेशन करने को तैयार किया, तब डॉ. तैयार हुए और ऑपरेशन करना पड़ा।  माताजी श्री कृष्ण मंदिर गई और भगवान को संकल्प कर वचन दिया कि यदि उनके (बेटे की) आँखें वापस आती हैं, तो बेटा पैदल बालाजी और पंढरपुर जाकर फिर वापस द्वारका आएगा, इसलिये मैं माँ के वचनों के लिये पदयात्रा कर रहा हूं । फिर मैंने उनकी धर्मपत्नी के बारे में पुछा तो बोले कि वो मुझे अकेले छोड़ने को तैयार न...

गोरखनाथ की सिद्धि को फेल करना

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"एक #सिद्धि पांचों तत्व नीरम" एक सिद्धि ऐसी होती है जो पांचों #तत्वों को पानी बना देती है। यह सिद्धि किसी को प्राप्त नहीं है, बहुत विरले को ही प्राप्त होती है। काशी में #कबीर परमेश्वर जी और गोरखनाथ जी ज्ञान गोष्ठी हुई। #गोरखनाथ जी ने कहा मुझे ढूंढकर दिखाओ पानी में छलांग लगाकर #मछली बन गये। कबीर परमात्मा जी ने बाहर निकालकर गोरखनाथ बना दिया। तत्पश्चात् गोरखनाथ जी ने कहा कि आप पानी में छुपो, मैं ढूंढ दूंगा। तब कबीर परमेश्वर जी पानी में जाकर पानी बन गये अर्थात् पांचों तत्व #नीर हो गये। गोरखनाथ जी ने खूब प्रयत्न किया लेकिन नहीं ढूंढ पाए फिर परमात्मा बाहर आए। गोरखनाथ जी ने #ज्ञान समझा नाम लिया। Visit - Supremegod org

महान राजा शिवि

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शीनर पुत्र महाराजा शिवि बड़े ही दयालु और शरणागतवत्सल थे। एक बार राजा एक महान यज्ञ कर रहे थे। इतने में एक कबूतर आता है और राजा की गोद में छिप जाता है। पीछे से एक विशाल बाज वहाँ आता है और राजा से कहता है – राजन् मैने तो सुना था आप बड़े ही धर्मनिष्ठ राजा हैं फिर आज धर्म विरुद्ध आचरण क्य़ो कर रहे हैं। यह कबूतर मेरा आहार है और आप मुझसे मेरा आहार छीन रहे हैं। इतने में कबूतर राजा से कहता है – महाराज मैं इस बाज से डरकर आप की शरण में आया हूँ। मेरे प्राणो की रक्षा कीजिए महाराज। राजा धर्म संकट में पड़ जाते हैं। पर राजा अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करके कहते हैं – राजा – तुमसे डर कर यह कबूतर प्राण रक्षा के लिए मेरी शरण में आया हैं। इसलिए शरण में आये हुए इस कबूतर का मैं त्याग नहीं कर सकता। क्य़ोकि जो लोग शरणागत की रक्षा नहीं करते उनका कहीं भी कल्य़ाण नहीं होता। बाज – राजन् प्रत्येक प्राणी भूख से व्याकुल होते हैं। मैं भी इस समय भूख से व्याकुल हूँ। यदि मुझे इस समय य़ह कबूतर नहीं मिला तो मेरे प्राण चले जायेंगे। मेरे प्राण जाने पर मेरे बाल-बच्चो के भी प्राण चले जाय़ेंगे। हे राजन्! इस तरह एक जीव के प्राण ब...

भक्त मीराबाई की कथा

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मीरा बाई की कथा मीरा बाई का जन्म राजपूत जाति में हुआ था। महिलाओं को घर से बाहर जाने पर प्रतिबंध था, परंतु मीराबाई ने किसी की प्रवाह नहीं की। फिर उसका विवाह राजा से हो गया। राणा जी धार्मिक विचार के थे। उसने मीरा को मंदिरों में जाने से नहीं रोका, अपितु लोक चर्चा से बचने के लिए मीरा जी के साथ तीन-चार महिला नौकरानी भेजने लगा। जिस कारण से सब ठीक चलता रहा। कुछ वर्ष पश्चात् मीरा जी के पति की मृत्यु हो गई। देवर राजगद्दी पर बैठ गया। उसने कुल के लोगों के कहने से मीरा को मंदिर में जाने से मना किया, परंतु मीराबाई जी नहीं मानी। जिस कारण से राजा ने मीरा को मारने का षड़यंत्र रचा। विचार किया कि ऐसी युक्ति बनाई जाए कि यह भी मर जाए और बदनामी भी न हो। राजा ने विचार किया कि इसे कैसे मारें? राजा ने कहा कि सपेरे एक ऐसा सर्प ला दे कि डिब्बे को खोलते ही खोलने वाले को डंक मारे और व्यक्ति मर जाए। ऐसा ही किया गया। राणा जी ने अपने लड़के का जन्मदिन मनाया। उसमें रिश्तेदार तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति आमंत्रित किये। राजा ने मीरा जी की बांदी (नौकरानी) से कहा कि ले यह बेशकीमती हार है। मेरे बेटे का जन्मदिन है। दूर-दूर से र...

आदि सनातन धर्म

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सनातन धर्म तथा आदि सनातन धर्म.. #सनातन_धर्म का आधार पुराण है तथा #आदि_सनातन_धर्म का आधार गीता और चार वेद तथा पांचवा #सूक्ष्मवेद है। "सनातन धर्म" (हिन्दुओं) की साधना ॐ मंत्र तक की है। (गीता अ-8 श्लोक-13) तथा "आदि सनातन धर्म" की साधना तीन नाम (ॐ-तत्-सत्) के जाप से होती है। (गीता अ-17 श्लोक-23) #ॐ नाम ब्रह्म (काल) का जाप है। #तत् यह गुप्त नाम और सांकेतिक है। यह अक्षर पुरुष अर्थात् अक्षर ब्रह्म का जाप मन्त्र है। #सत् यह "परम अक्षर ब्रह्म" का जाप मन्त्र है। यह #सांकेतिक है, वास्तविक नाम है जो दीक्षार्थी को दीक्षा के समय बताया जाता है। तीन पुरुष अर्थात् #प्रभुओं की जानकारी गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में है। पूर्ण सन्त #रामपाल जी महाराज ने आदि सनातन धर्म की पुनः स्थापना की है। आदि सनातन धर्म जानने के लिए देखिए-- साधना चैनल - 7:30pm. ईश्वर चैनल - 8:30pm. Must Visit - Supremegod org

गुरु भक्त अरूणी

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महर्षि आयोदधौम्य के पूरे आश्रम में म‍हर्षि की मंत्र वाणी गूंजती रहती है। गुरुजी प्रात: 4 बजे उठकर गंगा स्नान करके लौटते, तब तक शिष्यगण भी नहा-धोकर बगीची से फूल तोड़कर गुरु को प्रणाम कर उपस्थित हो जाते। आश्रम, पवित्र यज्ञ धूम्र से सुगंधित रहता। आश्रम में एक तरफ बगीचा था। बगीचे के सामने झोपड़ियों में अनेक शिष्य रहते थे।  गुरु के शिष्यों में तीन‍ शिष्य बहुत प्रसिद्ध हुए। वे परम गुरु भक्त थे। उनमें बालक आरुणि भी एक था।एक दिन की बात है सायंकाल अचानक बादलों की गर्जना सुनाई देने लगी... घड़ड़ड़... घड़ड़ड़...। बादलों की गर्जन सुन मोर टहूके- पिऽऽ कोऽऽ क! पिकोऽ का!   ताल-तलैया के किनारे उछलते-कूदते मेंढक टर्राए... टर्र... टर्र... ऽऽ।  गुरुजी ने आकाश की ओर देखा- अरे! वर्षा का मौसम तो बीत गया। अब अचानक उमड़-घुमड़कर बादल क्यों छा रहे हैं। लगता है वर्षा होगी।  तभी बड़ी-बड़ी बूंदें बरसने लगीं। देखते ही देखते मूसलधार वर्षा शुरू हो गई।कुछ दूर गुरुजी के खेत थे। गुरुजी ने सोचा कि कहीं अपने धान के खेत की मेड़ अधिक पानी भरने से टूट न जाए। खेतों में से सब पानी बह जाएगा। मिट्टी कट जाएग...

#EternalHome_Satlok

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आईए दोस्तो  जानते हैं के बारे में जहाँ कभी  किसी की म्रत्यु नही होती... 👇 पवित्र गीता जी अध्याय 18 श्लोक 62 से 66 के अनुसार... 👇  "सतलोक"  स्वर्ग और महास्वर्ग से अलग वो स्थान है जहां जाने के बाद प्राणी संसार मे लौट कर नही आते यहां के सभी जीवों का असली ठिकाना शास्वत स्थान सतलोक ही है... 👇 सतलोक में एक तत्व का बना नूरी शरीर है। उसमें कोई रोग या बीमारी नहीं होती... 👇 सतलोक में पृथ्वी की तरह कोई प्रदूषण नही है, न वहां प्राकृतिक आपदा या कोई महामारी होती... 👇 अमरलोक जाने के लिए पूर्ण सन्त की शरण लेकर शास्त्रनुकूल सतभक्ति करनी पड़ती है तभी पूर्ण मोक्ष प्राप्त हो सकता है.. 👇 सतलोक सुख का सागर है वहां किसी वस्तु का अभाव नहीं वहां सभी वस्तुओं का भंडार भरा पड़ा है 👇 सदा ही सदवहार वृक्ष लगे रहते हैं किसी भी मौसम का कोई कहर नही है... 👇 पृथ्वी पर इंसान भूखे रहते हैं वस्तुओं के अभाव में कष्ट पाते हैं।  👇 सतलोक में पृथ्वी की तरह कोई युद्ध, लड़ाई झगड़े, राग द्वेष लड़ाई झगड़े आदि नहीं होते... 👇  क्योंकि वहां किसी चीज़ की कमी नहीं सबका अलग स्थान है। सबके अपने निजी विमान है...

Secret_of_Bible

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#Secret_of_Bible ईसा मसीह परमेश्वर नहीं थे, उन्होंने हमेशा स्वयं को परमेश्वर का पुत्र कह कर सम्बोधित किआ था। परमेश्वर यानी की पूर्ण अविनाशी परमात्मा कभी माता की गर्भ से जन्म नहीं लेता ना ही उसकी मृत्यु हो सकती है। परमात्मा की परिभाषा भी यही है की वह परम आत्मा जो जन्म और मृत्यु के बंधन से परे हो जो हमे पूर्ण मोक्ष प्रदान कर सके।  लेकिन ईसा मसीह जी के माता पिता थे, इनकी पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पूज्य पिता जी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने ईसा को जन्म दिया। हजरत ईसा से पवित्र ईसाई धर्म की स्थापना हुई। ईसा मसीह के नियमों पर चलने वाले भक्त आत्मा ईसाई कहलाए तथा पवित्र ईसाई धर्म का उत्थान हुआ। हम सभी जानते ईसा मसीह ने ज़िन्दगी भर कैसे कष्ट झेले व् उनकी मृत्यु कितनी दर्दनाक थी। हजरत ईसा मसीह की मृत्यु 30 वर्ष की आयु में हुई जो पूर्व ही निर्धारित थी। यह सिर्फ संत रामपालजी महाराज ने शास्त्र प्रमाणित करके बताया है की पूर्ण अविनाशी परमात्मा सिर्फ कबीर साहेब है जिसका वर्णन पवित्र बाइबिल, पवित्र क़ुरान शरीफ, हिन्दू सत्ग्रन्थ व् गुरु ...

जन्म और मृत्यु का रहस्य

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जन्म मृत्यु का क्या रहस्य है। पृथ्वी पर इतनी सारी कष्ट है ,   और भक्ति सभी    धर्मों के लोग करते हैं ।   वह कौन है सुप्रीम परमात्मा जो दिल की पुकार को सुनता है और वह बहुत ही दयालु परमात्मा है।  जिसकी महिमा हर धर्म ग्रंथों में बताई गई है। सुप्रीम परमात्मा के सभी बच्चे हैं। परमात्मा के नजर में सभी एक हैं , सुप्रीम परमात्मा सिर्फ अपनी आत्मा देखता है जाति भेदभाव और मजहब नहीं।   परमात्मा के लिए कोई जाति भेदभाव नहीं होता यह संत रामपाल जी महाराज जी बताते हैं। और भी गूढ़ रहस्य के लिए हर दिन अवश्य देखिए संत रामपाल जी महाराज जी का सत्संग साधना चैनल पर शाम 7:30 pm

#5जून_महासत्संग_साधनाTVपर #5thJuneKabirPrakatDiwas

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🌺 *सतगुरु रामपाल जी महाराज जी* प्रमाणित करके बताते हैं :- 🏅अद्भुत ज्ञान कबीर परमेश्वर ने ही सतलोक के विषय में बताया कि ऊपर एक ऐसा लोक है जहां सर्व सुख है। वहां कोई कष्ट नहीं है। जिसकी गवाही संत गरीबदास जी ने दी है। गरीब, संखो लहर महर की उपजै, कहर जहां न कोई। दास गरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई।। 🏅तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की वास्तविक स्थिति से परिचित करवाते हुए परमात्मा कबीर जी ने कहा :- तिनके सूत है तीनों देवा, आंधर जीव करत हैं सेवा। 🏅कबीर परमात्मा का तत्वज्ञान काल कौन है, कहां रहता है, वह हमें कष्ट क्यों देता है, काल के सभी कार्यों के बारे में परमात्मा कबीर जी ने ही विस्तार से बताया है । सतलोक पृथ्वी लोक से कितनी दूरी पर स्थित है और वहां कैसे जाया जा सकता है। यह जानकारी कबीर परमात्मा जी ने ही दी है । 🏅तत्वज्ञान कबीर साहेब ने ही हमें अवगत कराया कि हमें जन्म देने व मारने में काल (ब्रह्म) प्रभु का स्वार्थ है जोकि श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में कहता है कि मैं बढ़ा हुआ काल हूँ अर्जुन। 🏅कबीर परमात्मा जी का बताया परम गूढ़ ज्ञान कबीर परमात्मा ने अध्यात्म के बहुत स...

#DeepKnowledge_Of_GodKabir #2DaysLeft_KabirPrakatDiwas

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‘‘काशी में भोजन-भण्डारा करना’’ जब कबीर जी काशी में लीला से लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर शिशु रूप में प्रकट होकर लीला करने आए हुए थे। उसी समय एक रामानन्द जी पंडित थे जो प्रसिद्ध आचार्य माने जाते थे। उनको कबीर परमेश्वर जी ने अपने सत्यलोक के दर्शन कराए, अपना परिचय कराया। फिर वापिस शरीर में लाकर छोड़ा। उसके पश्चात् स्वामी रामानन्द जी ने कहा :- दोहू ठौर है एक तू, भया एक से दोय। गरीबदास हम कारणें, आए हो मग जोय।। बोलत रामानन्द जी, सुन कबीर करतार। गरीबदास सब रूप में, तुम ही बोलनहार।। तुम साहब तुम संत हो, तुम सतगुरू तुम हंस। गरीबदास तव रूप बिन, और न दूजा अंश।। भावार्थ :- स्वामी रामानन्द जी ने कहा है कि हे कबीर जी! आप ऊपर सतलोक में भी हैं, आप यहाँ हमारे पास भी विद्यमान हैं। आप दोनों स्थानों पर लीला कर रहे हैं। वास्तव में आप ही साहब यानि परमात्मा हैं। वास्तव में आप ही पूर्ण संत के गण हैं और वास्तव में सतगुरू भी आप ही हैं तथा एक वास्तविक हंस यानि जैसा भक्त होना चाहिए, वे लक्षण भी आप में ही हैं।  कबीर जी एक उदाहरण पेश कर रहे थे कि जैसे मैं मेहनत करके धन कमाता हूँ, भक्ति भी करता हूँ तथा निर्ध...

कबीरपरमेश्वर_की_लीलाएं

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🌺 *सतगुरु रामपाल जी महाराज जी* प्रमाणित करके बताते हैं :- 🔅कबीर साहेब द्वारा सर्वानंद को शरण में लेना पंडित सर्वानंद ने अपनी माँ से कहा कि मैंने सभी ऋषियों को शास्त्रार्थ में हरा दिया है तो मेरा नाम सर्वाजीत रख दो लेकिन उनकी माँ ने सर्वानंद से कहा कि पहले आप कबीर साहेब को शास्त्रार्थ में हरा दो तब आपका नाम सर्वाजीत रख दिया जाएगा। जब सर्वानंद कबीर साहेब के पास शास्त्रार्थ करने पहुँचे तो कबीर साहेब ने कहा कि आप तो वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हैं मैं आपसे शास्त्रार्थ नहीं कर सकता। तब सर्वानंद ने एक पत्र लिखा कि शास्त्रार्थ में सर्वानंद जीते और कबीर जी हार गए। उस पर कबीर साहेब जी से अंगूठा लगवा लिया। लेकिन जैसे ही सर्वानंद अपनी माँ के पास जाते तो अक्षर बदल कर कबीर जी जीते और पंडित सर्वानंद हार गए ये हो जाते। ये देखकर सर्वानंद आश्चर्य चकित हो गए और आखिर में हार मानकर सर्वानंद ने कबीर साहेब की शरण ग्रहण की। 🔅सम्मन को पार करना सम्मन बहुत गरीब था। जब कबीर परमात्मा का भक्त बना। तब परमात्मा के आशीर्वाद से दिल्ली का महान धनी व्यक्ति हो गया, परंतु मोक्ष की इच्छा नहीं बनी। सम्मान ने अपने परमेश्वर रू...